याद आते हैं, स्‍व. श्री विश्‍वभ्‍भर नाथ ठाकुर रचित

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याद आते हैं
सुगंध जिनकी
समा गई सांसों में
याद आते हैं ।

जो बस गए आंखों में
सोई मेरी पलकों में
याद आते हैं अधर
रस जिनका मधुर
धुल गया मेरे प्राणों में ।

याद आते हैं ।

पद कमल कोमल
बोल रहे जिनकी पायल,
चुपके-चुपके सूने में,
बाट जोहता सुनता मैं,
खिंच रहे बरबस पांव,
फैलाएं बेसुध बांह,
पुकारते प्यार!

छिपे कहां ?

धरा में ?

गगन में ?

स्‍व. श्री विश्‍वभ्‍भर नाथ ठाकुर